मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर फिर गरमाई बहस, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद चर्चा में आए ज्ञानेश कुमार

नई दिल्ली

देश में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त डॉ. विवेक जोशी और सुखबिंदर सिंह संधू की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी की। अदालत ने सवाल उठाया कि जब चयन समिति में प्रधानमंत्री और एक कैबिनेट मंत्री दोनों सरकार की ओर से होंगे, तो विपक्ष के नेता की भूमिका कितनी प्रभावी रह जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति नई कानूनी व्यवस्था के तहत पहली बार हुई है। यही वजह है कि यह मामला संवैधानिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इसी संदर्भ में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में एक अहम फैसला दिया था। अदालत ने कहा था कि जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक विशेष समिति की सिफारिश पर की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई उस अंतरिम समिति में तीन सदस्य शामिल किए गए थे—
प्रधानमंत्री
भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित न्यायाधीश
लोकसभा में विपक्ष के नेता

अदालत का तर्क था कि इस व्यवस्था से नियुक्ति प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और संतुलित दिखाई देगी।

फिर सरकार ने बनाया नया कानून
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने दिसंबर 2023 में संसद से नया कानून पारित कराया। इस कानून के तहत नियुक्ति समिति की संरचना बदल दी गई। नई व्यवस्था में समिति के सदस्य बनाए गए—
प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री
लोकसभा में विपक्ष के नेता
यानी मुख्य न्यायाधीश को समिति से बाहर कर दिया गया। इसी नई व्यवस्था के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी वाली समिति ने ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या सवाल उठाए?
मामले की ताजा सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यदि समिति में प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री दोनों सरकार की ओर से होंगे, तो विपक्ष के नेता की भूमिका क्या रह जाएगी? अदालत ने संकेत दिया कि ऐसी स्थिति में निर्णय स्वाभाविक रूप से सरकार के पक्ष में झुक सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री अलग-अलग राय रखने की स्थिति में नहीं माने जाते।
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समिति में दो सदस्य सरकार के होने से चयन प्रक्रिया में संतुलन नहीं रह जाता और विपक्ष की भूमिका केवल औपचारिक बनकर रह जाती है।
पहले कैसे होती थी नियुक्ति?
दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई औपचारिक समिति व्यवस्था मौजूद नहीं थी। परंपरागत रूप से सरकार नाम तय करती थी और प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति नियुक्ति को मंजूरी दे देते थे।
यानी लंबे समय तक यह प्रक्रिया पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में रही। लेकिन चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर उठे सवालों और कई विवादों के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इसके बाद अदालत ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर समिति मॉडल लागू किया था।
अब असली संवैधानिक सवाल क्या है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संसद द्वारा बनाए गए कानून को सुप्रीम कोर्ट खारिज कर सकता है?
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन यदि कोई कानून संविधान की मूल भावना, लोकतांत्रिक संतुलन या संस्थाओं की स्वतंत्रता के खिलाफ पाया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए और होनी भी चाहिए। वहीं केंद्र सरकार का पक्ष यह है कि संसद ने संवैधानिक अधिकारों के तहत कानून बनाया है और वही अंतिम व्यवस्था मानी जानी चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
चुनाव आयोग देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक है। लोकसभा, विधानसभा और राष्ट्रपति चुनाव कराने की जिम्मेदारी इसी संस्था के पास होती है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठने वाले सवाल सीधे चुनावी निष्पक्षता और लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़े माने जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। आने वाले समय में अदालत का फैसला यह तय कर सकता है कि देश में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया का अंतिम ढांचा क्या होगा और उसमें न्यायपालिका, सरकार तथा विपक्ष की भूमिका कितनी होगी।