Bhagwan Birsa Munda:
भगवान बिरसा मुंडा ने छोटा जीवन जिया पर करोड़ों के लिए प्रेरणा बन गए। उनकी शहादत व्यर्थ न जाए। उनका उलगुलान आज भी जारी है – अशिक्षा के खिलाफ, शोषण के खिलाफ, पर्यावरण की लूट के खिलाफ — हर्ष मल्होत्रा
Bhagwan Birsa Munda
नई दिल्ली 9 जून : भगवान बिरसा मुंडा की 126वीं पुण्य तिथि पर आज 9 जून को प्रातः दिल्ली प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के जनजाति मोर्चे द्वारा बसेरा पार्क में उनके प्रति पुण्य स्मरण कार्यक्रम का आयोजन किया।
कार्यक्रम में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष श्री हर्ष मल्होत्रा ने भगवान बिरसा मुंडा के स्मृति स्थल पर दिल्ली भाजपा के एस.टी. मोर्चा अध्यक्ष श्री सी.एल. मीणा और अन्य कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में सर्वप्रथम पुष्पांजलि के रूप में श्रद्धासुमन अर्पित किये।
श्री हर्ष मल्होत्रा ने इस अवसर पर कहा की आज 9 जून 2026, धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी की 126वीं पुण्यतिथि है।
9 जून 1900 को मात्र 25 वर्ष की आयु में रांची जेल में अंग्रेजों की क्रूरता ने इस महापुरुष को हमसे छीन लिया था। पर भगवान बिरसा मरे नहीं – वे हर आदिवासी के हृदय में, हर जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में आज भी जीवित हैं।
भगवान बिरसा मुंडा केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। वे एक क्रांतिकारी संत थे। 1895 में जब अंग्रेजों ने “जमींदारी प्रथा” और “बेगार” से आदिवासियों की जमीन छीननी शुरू की, तब 20 साल की उम्र में भगवान बिरसा मुंडा ने कहा था – “अबुआ दिशोम, अबुआ राज” यानी हमारा देश, हमारा राज।
उन्होंने उलगुलान यानी महाविद्रोह का बिगुल फूंका। तीर-कमान से लैस मुंडा आदिवासियों ने अंग्रेजी बंदूकों को चुनौती दी।
बिरसा ने हमें 3 सबसे बड़े मंत्र दिए:
- जल-जंगल-जमीन की रक्षा: बिरसा ने सिखाया कि जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं, आदिवासी की मां है। आज जब पर्यावरण संकट है, बिरसा का संदेश सबसे ज्यादा प्रासंगिक है।
- अंधविश्वास से मुक्ति: उन्होंने “बिरसाइत धर्म” चलाकर शराब, पशुबलि, शोषण का विरोध किया। कहा – “साफ-सुथरा रहो, पढ़ो-लिखो, एक ईश्वर को मानो”।
- स्वाभिमान से समझौता नहीं: अंग्रेजों ने उन्हें जेल में जहर दिया, पर वे झुके नहीं। 25 साल की उम्र में शहादत दी पर सिर नहीं झुकाया।
आज 2026 में जब हम उनकी पुण्यतिथि मना रहे हैं, तो सिर्फ माला पहनाना काफी नहीं। बिरसा पूछेंगे – “मेरे आदिवासी भाई की जमीन बची है क्या? मेरे बच्चे स्कूल जा रहे हैं क्या? मेरे जंगल सुरक्षित हैं क्या?”
आइए आज संकल्प लें की भगवान बिरसा मुंडा के नाम पर एक पेड़ लगाएं। किसी आदिवासी बच्चे की पढ़ाई का जिम्मा लें। और सबसे जरूरी – अन्याय के सामने चुप न रहें। क्योंकि बिरसा ने कहा था – “डरना मत, लड़ना सीखो”।
भगवान बिरसा मुंडा ने छोटा जीवन जिया पर करोड़ों के लिए प्रेरणा बन गए। उनकी शहादत व्यर्थ न जाए। उनका उलगुलान आज भी जारी है – अशिक्षा के खिलाफ, शोषण के खिलाफ, पर्यावरण की लूट के खिलाफ।
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