Balmiki Jayanti Special:
भगवान वाल्मीकि का नाम आते ही सबसे पहले रामायण का स्मरण होता है। पर इस पहचान के पीछे एक और परिचय है, जिस पर कम चर्चा होती है। कवि के रूप में प्रसिद्ध होने से पहले वे एक गुरु थे, और उनका आश्रम संभवतः उन आरंभिक पाठशालाओं में से था, जहां से किसी को लौटाया नहीं जाता था।
Balmiki Jayanti Special
कवि से पहले गुरु- भगवान वाल्मीकि को ऋषि प्रचेता का पुत्र माना जाता है। ज्ञान का उनका मार्ग सरल नहीं था। मान्यता है कि उन्होंने इतनी लंबी तपस्या की कि उनके चारों ओर दीमक की बांबी, यानी वल्मीक, बन गई। उसी से उनका नाम पड़ा। जिसने स्वयं ऐसी साधना की हो, वह जानता है कि सीखना कितना कठिन है और सिखाने की जिम्मेदारी कितनी बड़ी।
उनका आश्रम राजमहलों से दूर, वन के किनारे था। फिर भी वहां राजकुमार भी आते थे और वनवासी परिवारों के बालक भी। सब साथ बैठते थे, एक ही पाठ पढ़ते थे और एक ही अनुशासन में रहते थे। जिस युग को हम अक्सर कठोर मान लेते हैं, उसमें यह स्थान चुपचाप हर भेद को पीछे छोड़ देता था।
कथा को घर तक पहुंचाने वाले शिष्य-
लव और कुश का पालन-पोषण इसी आश्रम में हुआ। भगवान वाल्मीकि ने उन्हें शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा दी, गायन की कला सिखाई और अपनी रचित रामायण भी कंठस्थ कराई। जब दोनों बालकों ने अयोध्या में उसे गाया, तब भगवान श्रीराम की कथा उन्हीं तक उनके रचयिता के शिष्यों के माध्यम से पहुंची।
जिनके पास कुछ नहीं बचा, उनके लिए सम्मान
जब माता सीता को अयोध्या छोड़नी पड़ी, तब इसी आश्रम में उन्हें सहारा मिला। भगवान वाल्मीकि ने न प्रश्न खड़े किए, न यह हिसाब लगाया कि सहायता करने की कीमत क्या होगी। उन्होंने माता सीता को सुरक्षित आश्रय दिया, पिता जैसा मान दिया और उनके पुत्रों को अपनी देखरेख में बड़ा किया। करुणा की बात बहुत लोग करते हैं, उन्होंने उसे किसी के जीवन की सबसे कठिन घड़ी में निभाया।
यह पर्व सबका क्यों है?
इसी उदारता के कारण वाल्मीकि जयंती किसी एक समाज का पर्व नहीं रह जाती। मंदिरों में पूजन होता है, शोभायात्राएं निकलती हैं, रामकथा और भजन-कीर्तन के आयोजन होते हैं, और उनमें हर पृष्ठभूमि के लोग जुड़ते हैं। रामलीला के मौसम में भी उनसे जुड़ाव दिखता है। अनेक समितियां मंचन से पहले अमृतसर स्थित भगवान वाल्मीकि तीर्थ स्थल (राम तीर्थ) जाती हैं, जिसे उनके आश्रम की भूमि माना जाता है, और वहां से पवित्र जल व अखंड ज्योति लेकर आती हैं।
आजकी पाठशालाओं से कुछ प्रश्न
यह अवसर हमें कुछ सच्चे प्रश्नों के सामने खड़ा करता है। क्या हमारे विद्यालयों और संस्थानों में आज भी उस बच्चे के लिए जगह है, जो सबसे कम साधनों के साथ आता है? क्या हम नई पीढ़ी को अच्छे विचार आगे ले जाना सिखा रहे हैं, या केवल उन्हें सहेजकर रखना? और जब कोई बिना सहारे के रह जाए, तब हममें से कौन अपना द्वार खोलता है?
भगवान श्रीराम के आदर्श आज इसलिए जीवित हैं कि एक गुरु ने उन्हें लिखा और फिर दूसरों को उन पर चलना सिखाया। उनके जन्मोत्सव पर इसका एक अंश अपने जीवन में उतारना ही सबसे उचित स्मरण होगा।
लेखक परिचय: प्रभाकर पाठक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उन्हें 20 वर्षों से अधिक का मीडिया अनुभव है। दिल्ली प्रांत में घुमंतू समाज के विभिन्न विषयों पर अध्ययन करते है। ये उनके निजी विचार हैं।

